बलिया के जेल कैदीयों को अनोखी सजा, भूखे कटनी पड़ती है पूरी रात
बलिया में जिला कारागार न होने से मऊ और आजमगढ़ की जेलों में विस्थापित बंदियों की रातें वाकई भारी बेचैनी और मानसिक प्रताड़ना में कट रही हैं।
बलिया जिला कारागार पुराने को खाली कराकर मेडिकल कॉलेज के लिए जमीन आवंटित किए जाने के बाद से यहां के करीब 900 से अधिक कैदियों को दूसरे जिलों में स्थानांतरित कर दिया गया है।
इस विस्थापन के कारण मऊ और आजमगढ़ जेलों में बंदियों को जिन मुख्य समस्याओं और मानसिक तनाव का सामना करना पड़ रहा है, उसका विवरण नीचे दिया गया है:
ओवरक्राउडिंग (अत्यधिक भीड़भाड़):
बलिया के कैदीयों को अचानक मऊ और मऊ और आज़मगढ़ में शिफ्ट किए जाने से वहां की बैरकों में क्षमता से अधिक कैदी हो गए हैं। जगह की कमी के कारण कैदियों को सोने और बैठने तक में भारी असुविधा होती है, जिससे उनकी रातें करवटें बदलते हुए कटती हैं।
परिजनों से मुलाकात में संकट:
बलिया से मऊ और आजमगढ़ की दूरी अधिक होने के कारण गरीब परिवार के लोग हर हफ्ते अपने परिजनों (कैदियों) से मिलने नहीं जा पाते हैं। अपनों से न मिल पाने की वजह से कैदी गहरी मानसिक चिंता और अकेलेपन (होमसिकनेस) के शिकार हो रहे हैं।
भूखे पेट रहने की विवशता:
बलिया कोर्ट में पेशी के लिए कैदियों को सुबह ही कड़े पहरे में निकाला जाता है। दिनभर अदालती कार्यवाही और फिर बलिया से मऊ या आजमगढ़ वापस लौटने के सफर में देर रात हो जाती है। जेल मैनुअल के अनुसार रात का खाना नियत समय (शाम ढलने के आसपास) बन और बंट जाता है। देर रात लौटने के कारण इन विस्थापित बंदियों को अक्सर ठंडा, बचा-कुचा खाना मिलता है या कई बार वे भूखे पेट ही सोने को मजबूर हो जाते हैं।
प्रशासनिक और कानूनी चुनौतियाँ
सुरक्षा और लॉजिस्टिक्स का दबाव:
रोजाना पुलिस वैन के जरिए कैदियों को लंबी दूरी तय कराकर बलिया कोर्ट लाना और वापस ले जाना पुलिस प्रशासन के लिए भी एक बड़ी सुरक्षा चुनौती बन गया है।
जेल निर्माण में देरी:
बलिया में नये जेल के लिए करीब 100 एकड़ भूमि चिह्नित होने और बजट पास होने के बावजूद धरातल पर निर्माण कार्य तेजी से शुरू न हो पाने के कारण बंदियों और उनके अधिवक्ताओं में असंतोष है।